chhappya class 12 summary

नाभादास का छप्पय / Nabhadas ka chhappya explanation

 नाभादास 

परिचय जीवन परिचय :- सगुणोपासक रामभक्त कवि नाभादास का जन्म अनुमानतः 1970 ई . में दक्षिण भारत में हुआ माना जाता है । बचपन में | सत्संग द्वारा जानार्जन किया । ये लोकप्रमण , भगवदभक्ति काव्य रचना तथा वैष्णव दर्शन - चिंतन में विशेष रवि रखते थे । स्वामी रामानंद की शिष्य परंपरा के प्रसिद्ध कवि स्वामी अग्रदास ने इनको गुरु के रूप में दीक्षा दी अधिकतर विद्वानों के अनुसार नाभादास जी की पारिवारिक सामाजिक पृष्ठभूमि दलित वर्ग की थी । इनकी मृत्य का समय अभी तक ज्ञात नहीं है । 

रचनाएँ :- भक्तमाल ( रचनाकाल 1585-1596 निर्धारित ) अष्टयाम ( ब्रजभाषा गय में अष्टयाम ( रामचरितमानस की दोहा चौपाई शैली में ) रामचरित संबंधी प्रकीर्ण पदों का संग्रह । 

काव्यगत विशेषताएँ :- नाभादास एक भावुक , सहदय , विवेक संपन्न एवं सच्चे वैष्णव थे । उनमें किसी प्रकार का पक्षपात , दुराग्रह या कट्टरता नहीं थी । ' भक्तमाल ' उनके शील , सोच एवं मानस का निर्मल दर्पण है । उन्होंने अपनी अभिरुचि , ज्ञान , विवेक , भाव - प्रसार आदि के द्वारा अपनी प्रतिभा का प्रकर्ष उपस्थित किया है । ' भक्तमाल ' ग्रंथ में लिखे 16 छप्पय उनकी तल स्पर्शिणी अंतदृष्टि , मर्मग्राहिणी प्रज्ञा , सारसग्राही चिंतन और विदग्घ भाषा शैली के अद्भुत नमूने हैं । इनके पीछे कवि के विशाल अध्ययन , सूक्ष्म पर्यवेक्षण , प्रदीर्घ मनन और अंतरंग अनुशीलन छिपे हुए हैं ।


  भाषागत विशेषताएँ: - नाभादास द्वारा अपने युग के अनुरूप श्रेष्ठ भाषा का प्रयोग किया गया है । शब्दों का कुशल प्रयोग , संगीतात्मकता एवं प्रवाहमयता उनकी भाषा के विशेष गुण हैं । उनके काव्य की भाषा भावों की अभिव्यक्ति में पूर्णतया सक्षम है । विजयेंद्र स्नातक के अनुसार , ' नाभादास ' ने भक्तों के परिचय में जिस समास शैली का परिचय दिया है , वह उनके गंभीर चिंतन - मनन का परिणाम है । जिन भक्तों का परिचय उन्होंने लिखा है उनकी रचना शैली , काव्यकला , भक्ति पद्धति एवं अन्य विशिष्टिताओं आदि को प्रायः एक हो उप्पय में कूट - कूट कर समाविष्ट कर दिया है । 
            यहाँ प्रस्तुत कबीर तथा सूरदास पर लिखे दोनों पद नाभादास द्वारा रचित ' भक्तमाल ' में संकलित है । प्रथम हप्पय में उन्होंने कबीर के भक्तिपूर्ण अंतःकरण तथा गंभीर मति की प्रशंसा की है । दूसरे छप्पय में उन्होंने हरदास जी के काव्य की युक्तियों , चमत्कार , चातुर्य आदि की प्रशंसा की है । ये दोनों छंद वैष्णव भक्ति की बतांत भिन्न दो शाखाओं के इन महान भक्त कवियों से संबंधित अब तक के संपूर्ण अध्ययन विवेचन के सार सूत्र हैं।


Board Class 12th Hindi Book Solutions पद्य :--

1. कड़बक

2. पद सूरदास

3. पद तुलसीदास

4.छप्पय 

5.कविप्त 

6. तुमुल कोलाहल कलह में 

7. पुत्र वियोग 

8.उषा

10.अधिनायक 

11.प्यारे नन्हें बेटे

12. हार जित

13. गांव का घर


 नाभादास का छप्पय

                     ( 1 ) 

भगति विमुख जे धर्म सो सब अयर्भ करि गाए । 

योग या त दान भजन बिनु तुष्ट दिखाए ।।

हिंदू तुरक प्रमान रमेनी सबदी साधी । 

पक्षपात नहि बचन सबहिके हितकी भाषी ।। 

आरूढ़ दशा है जगत पै , मुख देखी नाहीं भनी । 

कबीर कानि राखी नहीं , वर्णाश्रम घट दर्शनी ।। 

 

प्रसंग : = प्रस्तुत छप्पय नाभादास द्वारा रचित ' भक्तमाल ' से लिया गया है । इस छप्पय में नाभादास ने क्रांतिकारी कवि कबीर की मति की गंभीरता तथा अंतःकरण की भक्ति से पूर्णता का वर्णन किया है । यह छप्पय कबीर से संबंधित उनके सम्पूर्ण अध्ययन तथा विवेचन का सार - सूत्र है ।

छप्पय का व्याख्या : = नाभादास जी कहते हैं कि कबीर जी की मति अति गंभीर तथा अन्तःकरण भक्ति रस से परिपूर्ण था । जाति - पाति वर्णाश्रम आदि साधारण धर्मों को नहीं मानते थे । उन्होंने केवल श्री भक्ति ( भागवत धर्म ) को ही दुढ़ किया । उनके अनुसार जो भी धर्म भक्ति से विमुख करते हैं , उन सबको अधर्म ' ही कहा जा सकता है । उन्होंने सच्चे उदय के बिना किए गए भजन , बंदगी के बगेर तप , योग , यज्ञ , दान , व्रत आदि को तुच्छ एवं महत्वहीन बताया है । 

कबीर के रमैनी , शबद , साखी आदि इस बात के प्रामाण हैं कि उन्होंने हिन्दु तया मुस्लमानों के बीच कोई पक्षपात नहीं किया । उनके वचनों में तो सबके हित की बात नजर आती है । कबीर जाति - पाति के भेदभाव से ऊपर उठकर केवल शुद्ध अन्तः करण से की गई भक्ति को ही श्रेष्ठ मानते हैं । वे जगत की दशा के अनुरूप चलते हुए मुंह देखकर बात करने बाले नहीं हैं । उन्होंने वर्णाधम के सभी छः दर्शनों की सच्चाई को खोलकर रख दिया है तथा किसी के प्रति पक्षपात नहीं किया है । 


                  ( 2 ) 

सूरदास उक्ति चोज अनुप्रास वर्ण अस्थिति अतिभारी । 

बचन प्रीति निर्वही अर्थ अद्भुत तुकधारी ।। 

प्रतिबिंबित दिवि दृष्टि हृदय हरि लीला भासी । 

जन्म कर्म गुन रूप सबहि रसना परकासी ।। 

विमल बुद्धि हो तासुकी , जो यह गुन श्रवननि परे । 

सूर कवित सुनि कौन कवि , जो नहि शिरचालन करे ।। 


  प्रसंग := प्रस्तुत छप्पय नाभादास द्वारा रचित ' भक्तमाल ' से लिया गया है । इस छप्पय में कवि ने सूरदास के काव्य की विभिन्न विशेषताओं का सुन्दर वर्णन किया है ।

 

छप्पय का व्याख्या := कवि कहते हैं कि सूरदास के पदों में नवीन युक्तियों , चमत्कार , चातुर्य , अद्भुत अनुप्रास तथा वर्णो के यथार्थ की अस्थिति बहुत सुन्दरता के साथ उभर कर आती है । वे कवित्त आदि में जिस प्रकार के वचन एवं प्रेम का वर्णन है उसका अंत तक निर्वाह करते हैं । कविता में तुकबंदी अद्भुत अयं प्रकट करती है प्रभु ने उनके हदय में दिव्य दृष्टि दी जिसमें भगवान की संपूर्ण लीलाओं का प्रतिबिंब भासित हुआ । 

       उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से प्रभु का । जन्म , कर्म , गुण , रूप आदि देखकर उसे अपनी सना ( जीभ ) से प्रकाशित किया । जो भी मनुष्य सूरदास द्वारा गाएका भगवद् गुणगान को अपने कानों में धारण करता है अर्थात् सुनता है उसकी बुद्धि निर्मल हो जाती है । नाभादास का जागे कहते हैं कि संसार में ऐसा कौन - सा कपि है जो सूरदास जी के काथ्य को सुनकर प्रशंसापूर्वक अपना सीसा भी हिलाता । 


Board Class 12th Hindi Book Solutions पद्य :--

1. कड़बक

2. पद सूरदास

3. पद तुलसीदास

4.छप्पय 

5.कविप्त 

6. तुमुल कोलाहल कलह में 

7. पुत्र वियोग 

8.उषा

10.अधिनायक 

11.प्यारे नन्हें बेटे

12. हार जित

13. गांव का घर


छप्पय का अभ्यास:-

प्रश्न 1. नाभादास ने उम्पय में कबीर की किन विशेषताओं का उल्लेख किया है । पनकी प्रम से सूची बनाया । 

उत्तर - नाभादास ने उप्पय में कबीर की निम्नलिखित विशेषताओं का उल्लेख किया है 

( 1 ) कबीर की मति अत्यंत गंभीर सया अंतःकरण भक्तिरस से पूर्ण था । 

( 2 ) कबीर हिन्दू , मुसलमान दोनों को ही प्रमाण तथा सिद्धांत का उपदेश देते हैं । 

( 3 ) जाति - पाति तथा वर्णाश्रम के कट्टर विरोधी थे । ( 4 ) कमीर के अनुसार , सच्चे हृदय से भजन के बिना तप , योग , दान , यत , व्रत आदि सब पर्य है । 

( 5 ) भगवद्भक्ति के अलावा जितने भी धर्म है , कबीर की नजर में वे सब अधर्म हैं । 

( 6 ) कबीर की नजर में भगवद्भक्ति ही साविष्ठ है । 


प्रश्न 2. ' मुख देवी नाहीं मनी ' का क्या अर्थ है ? कबीर पर यह केसे लागू होता है ?

कभी मुह देखी बातें नहीं की । सब को सच कहने में ये किसी की रानिक भी परवाह नहीं करते थे । राज सला हो या समान उत्तर - कधि नाभादास कबीर के अक्खड़ व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि ये ऐसे चेतना संपन्न कदि हैं जिनके जनता , पडित हो अथवा मुल्ला - मौलवी सबकी बखिया उधेड़ने में उन्होंने तनिक भी कोताही नहीं बरती । उन्होंने हमेशा लोकमत की बात की तथा भगवतभक्ति का उपदेश दिया । 


प्रश्न 3. सूर के काव्य की किन विशेषताओं का उल्लेख कवि ने किया है ।

 उत्तर : - कपि नाभादास जी ने अपने छायव में सूर के काव्य की निम्नलिखित विशेषताओं का उल्लेख किया है । 

 ( 1 ) सूरदास ने अपनी दिव्य दृष्टि से भगवान कृष्ण के जन्म , कर्म , गुण , रूप आदि को देखकर अपनी रसना से उरी प्रकाशित किया है । 

 ( 2 ) उनके काव्य में नवीन युक्तियों , चमत्कार , चातुर्य , अनूठे अनुप्रास तथा वर्गों के यथार्थ की उपस्थिति दर्शनीय है ।

 ( 3 ) कवित्त के प्रारंभ से अन्त तक सुन्दर प्रवाह दिखाई देता है । 

 ( 4 ) सूर के फक्ति को सुनकर लोग प्रशंसापूर्वक अपना सिर हिलाने लगते हैं । 

 (5 ) तुकों का अद्भुत अर्थ प्रकट हुआ है । 

 

प्रश्न 4: - अर्थ स्पष्ट करें 

( क ) सूर कवित सुनि कोन कवि , जो नहि शिरचालन करे । ( ख ) भगति विमुख जो धर्म सो सब अधर्म करि गाए । उत्तर- ( क ) नाभादास जी कहते हैं कि ऐसा कौन कवि होगा जो सूर की कविताएँ सुनकर अपना सिर नहीं झुकायेमा अर्थात् बड़े - बड़े कवि सूर की प्रतिभा के समक्ष नतमस्तक हो जाते हैं । 


( ख ) कवि नाभादास कबीर की वाणी के संदर्भ में करते है कि जो मनुष्य भक्ति से विमुख हे तया वाघाचार , धर्माबा , प्रेष्ठताबोध , पाखंड , घृणा , धार्मिक संकीर्णता आदि से ग्रस्त है वह धर्म के नहीं बल्कि अधर्म के मार्ग पर है । आश्चर्य तो इस बात का है कि ये अपने अधर्म को सी धर्म की संज्ञा देते हैं । वे धर्म के अर्थ को आत्मसात किये बिना अधर्म को ठी धर्म के नाम से उचारते रहते हैं । 


प्रश्न 5:- पक्षपात नहीं बचन सहि के हित की भाषी ' , इस पंक्ति में कबीर के किस गुण का परिचय दिया गया है ? उत्तर - उपरोक्त पक्ति में दर्शाया गया है कि कबीर की दृष्टि में हिन्दू , मुसलमान , आर्य , अनार्य में कोई भेद नहीं है । कीर सदैव सबके हित की बात करते हैं । वे सिद्धांतवादी व्यक्ति हैं तथा सिद्धांतों को लेकर आगे बढ़ते हैं । उनकी प्रखर चेतना में किसी प्रकार के बायाचार या आडंबर के लिए कोई स्थान नहीं है । 


प्रश्न 6. कविता में तुक का क्या महत्त्व है ? इन छप्पयों के संदर्भ में स्पष्ट करें । 

उत्तर :- कविता में चरणों के अन्तिम वर्णों की आवृत्ति को तुक कहा जाता है । प्रायः पाँच मात्राओं के ' तुक ' को उत्तम माना जाता है । संस्कृत भाषा के छंदों में ' तुक ' का महत्व नहीं था , किन्तु हिन्दी में तुक ही छन्द का प्राण है । ' ठप्पय ' के संदर्भ में तुक का महत्त्व - नाभादास ने अपने छप्पयों में बेजोड़ तुक का विधान किया है । तुक प्रयोग से इनके छप्पयों में जैसी लय है वह , हिन्दी साहित्य में अत्यंत दुर्लभ है । 







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