Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 7

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अभ्यास:-- 


प्रश्न1. पंपारन क्षेत्र में बाढ़ की प्रचंडता के बढ़ने के क्या कारण है?

 प्रकोप मानवीय स्वार्थपरता के कारण ही बड़े चंपारन क्षेत्र में भी बाइकी प्रचंडता फेबढ़ने में मनुष्य की हम भूमिका तो है।लसात सौ वर्ष पूर्व चंपारन क्षेत्रचने जंगलों से घिरा हुआ था तथा ये जंमन चंपारनगंगा तक फैले एपीर - धीरे नीम जंगलों को काटते गए । जंगलों में वृक्षों की जड़ें पानी को रोके रखती थी । किन्तु जंगलों के कटने के बाद पानी विस्तृत -भाग फैलना शुरू किया । इन्हीं सब कारणों से चंपारन में नाटकी प्रचंडता बढ़ती गई । 

 


प्रश्न 2. इतिहास की कीमिआई प्रक्रिया का क्या आशय है  

उतर - कीमिआई प्रक्रिया में पारे को कुछ विलेपनों के साथ उच्च ताप पर गर्म करके सोने में बदला जाता है । ने मिल्कुल भिन्न पदार्थ का रूप धारण कर लेता है , उसी प्रकार सुदूर दक्षिण की संस्कृति और रक्त इस प्रदेश की निधि बनकर अन्य संस्कृति का निर्माण कर गए । यही इतिहास की कीमिआई प्रक्रिया है । 


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प्रश्न 3. पांगड़ शब्द का क्या अर्थ है ? 

उत्तर - ओरॉव भाषा में ' भांगड ' शब्द का अर्थ है - भाड़े का मजदूर । झाँगड़ एक आदिवासी आति है जिसे 18वी शताब्दी के अंत में नील की खेती के सिलसिले में दक्षिण बिहार के छोटा नागपुर पठार क्षेत्र से चंपारन लाग्गा गया था । योगह जाति आदिवासी जातियों - ओरॉव , मुंडा , तोहार आदि को पंशज है । 

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प्रश्न 4. बारूओं की कता का परिचय पाठ के आधार पर दें। 

उत्तर - थारूओं की गृहकला अनुपम है । कला मूलतः उनके दैनिक जीवन का अंग है । थारुतीग यान रखने के पात्र को मौक से बनाते हैं , वह भी आकर्षक रंगों और डिजाइनों में । सोक लदा मूंज द्वारा घरेलू उपयोगिता के सामान बनाने में बारूओं का कोई | सानी नहीं है । उनकी कला और उसके सौन्दर्य की झलक उनके गृह सामानों में मिलती है । घनल सीपों तथा बीजा से बनाए जाने जाते आभूषण जो उनकी संस्कृति की झलक भी दिखलाते हैं , उनका उदाहरण लेखक ने नषषण मारा अपने प्रियतम को कलेर कराने के संदर्भ में झंकृत होने वाली येणियों से दिया है । यारूओं की कला उनकी मधुर और स्निग्ध संस्कृति की मनमोहक नलक प्रदर्शित करती है । 



प्रश्न 5. अंग्रेज नीलहे किसानों पर क्या अत्याचार करते थे ? 

उत्तर - जुल्म , अत्याचार और शोषण के द्वारा भारतीयों पर शासन करना अंग्रेजों की आदत बन गई थी । अंग्रेज किसानों से जबरदस्ती नील की खेती करवाते थे । हर किसान के लिए प्रति बीस कट्ठा जमीन में से तीन कट्ठा जमीन पर नील की खेती करना जरूरी था । चंपारन तथा उसके आस - पात्त के कुछ क्षेत्रों में नील की खेती कराने वाले गोरों का साम्राज्य या । निलो किसान गोरी के हाथ की कठपुतली थे । नील की माँग कम हो जाने पर फिर भी अंग्रेजों ने निलहे किसानों से जबरदस्ती छेती करवानी जारी रखी । इस प्रकार निलहे किसान अंग्रेजों के अत्याचारों से पूरी तरह अस्त थे । 



प्रश्न 6. गंगा पर पुल बनाने में अंग्रेजों ने क्यों दिलचस्पी नहीं ली ? 

उत्तर - अंग्रेजों ने गंगा पर पुल बनाने में इसलिए दिलचस्पी नहीं ली ताकि दक्षिण विहार के बागी विचारों का असर चंपारन में जल्दी से न पहुंच पाए तथा चंपारन पर ब्रिटिश साम्राज्य की छत्रछाया पाला शासन अनवरत चलता रहा । 


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प्रश्न 7. यंपारन में शिक्षा की यवस्था के लिए गांधीजी ने क्या किया ? 

उत्तर - चपारन में शिक्षा की व्यवस्था के लिए गाँधी जी ने कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए । इसके लिए उन्होंने बड़हरवा , मधुबन और भितिहरवा इन तीनों गाँवों में आबम विद्यालय स्थापित किए । कुछ निष्ठावान कार्यकर्ता तीनों गांवों में तैनात किए गए । बड़हरवा विद्यालय को यवनजी गोखले तथा उनकी विदुषी पत्नी अतिकाबाई गोखले ने चलाया । मधुबन में भरहरिहास पारिस , उनकी पत्नी तथा उनके सेक्रेटरी महादेव देसाई को नियुक्त किया गया । मितिहरवा विद्यालय वयोवृद्ध डॉक्टर देव और सोपन जी द्वारा चलाया गया । बाद में पुंडलिक जी वहाँ गए । भितिहरवा आश्रम में स्वयं कस्तूरया गांधी भी रहीं तथा इन कर्मठ और विधान स्वयंसेवकों की देखभाल की । 


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प्रश्न 8.गाँधी जी के शिक्षा संबंधी आदर्श क्या ? 

उत्तर - गाँधीजी के शिक्षा संबंधी आदर्श बड़े ही स्पष्ट थे । वह स्कूलों में किसी तरह का नपा - तुला पाल्यक्रम लागू नहीं करना पाहते थे बल्कि वे सीक से हटकर चलने के इच्छुक थे । उनके शिक्षा आदर्श के अनुसार , शिक्षा छोटे बच्चों के चरित्र और बुद्धि का विकास करने वाली होनी चाहिए । बच्चे ऐसे पुरुष और महिलाओं के सानिध्य में शिक्षा प्राप्त करें जो सुसंस्कृति हो तथा जिनका चरित्र निवकलित हो । गांधीजी अक्षर ज्ञान को तो उद्देश्य की प्राप्ति का मात्र एक साधन मानते थे । उनके अनुसार शिक्षा प्राप्ति का उद्देश्य केवल नौकरी प्राप्त करना ही नहीं बल्कि खेती और ग्रामीण जीवन को उत्तम बनाना भी होना चाहिए। 



प्रश्न 9. पुंडलिक जी कौन थे?

उत्तर- पुंडलिक जी भितिहरवा आश्रम विशालय में शिक्षक थे । गांधी जी ने 1917 में उन्हें विद्यालय में शिक्षा देने और प्राणी के भागारोहरण के लिए अलगौच से बुलाया था । पुरातीक जी . गाँधी जी के आदों को सच्चे दिल से मानने वाले बड़े ही सिम पुरुष थे । उनका व्यक्तिला काफी तेज पूर्ण तथा उनका शरीर बसिष्ठ व आगाज दबंग थी । पुतिक जी ने गाँधी जी निकता गाँव मालों को प्रदानकायही निकिता चपान अभियान की सबसे बडी देन है ।


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प्रश्न 10. गांधीजी के पारन आंदोलन की जिन दो सीमों का उल्लेख लेखक ने किया है । इन तीनों को आज आप for उपयोगी मानते । 

उत्तर - गोपीजी के पारन आंदोलन की जिन दो सीखों का मोल लेखक ने किया है । वे सदैव निर्भीकता से सना तथा पर बात को स्वयं सत्यापित करने के बाद ही उस पर अपनी प्रतिक्षिया देना । किसी भी बात को सत्यता के साथ करने के लिए निर्भीकता बात जरूरी होती है । पर निर्णय ले लेते है तथा किसी भी बात पर राहत विश्वास कर लेते हैं और दोषारोपण करने लगते हैं जो बहुत गलत है । इसके उतमान समय में ये दोनों सीखें काफी उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं , क्योंकि आजकल लोग बिना कुछ सोचे समझे किसी विषय दुष्परिणाम में भुगतने पड़ते हैं । 



प्रश्न 11. यह पात आपके समय कैसे प्रश्न खड़ा करता है ? 

उत्तर - या पात हमारे सामने विभिन्न प्रश्न खड़े करता है जो हमारी सांस्कृतिक परंपराएँ कहाँ लुप्त होती जा रही है । म प्रकृति के साथ किस प्रकार खिलवाड़ कर रहे हैं । गांधीजी का देश के विकास में कितना महत्त्वपूर्ण योगदान है । गांधीजी की दिनचर्या कितनी व्यस्त थी शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य  क्या है । बाढ़ आदि प्राकृतिक आपदाओं की वजह क्या है । हमारा इतिहास कितमा विस्तृत है । हमारे देश का प्राकृतिक सौंदर्य कितना अद्भुत और क्या नवयुग में होने वाले निर्माण वास्तव में हमारे विकास में योगदान देते है । ये कुछ ऐसे है जो पाठ पढ़ने के बाद हमारे जेहन में उभरने लगते हैं । 



प्रश्न 12 , असे स्पष्ट कीजिए 

( क ) पसुपरा भोगी मानव विमानव - एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । 

( ख ) केसी है पारन की यह भूमि ! मानो विस्मृति के शरयों अपनी बड़ी से बड़ी निधियों को सौंपने के लिए प्रस्तुत सती है ।

उत्तर -- ( क ) लेखक के अनुसार , पृथ्वी का भोग करने वाले अर्थात् चरती से पेड़ - पौधों आदि को नाट करके उससे लाभ उगाने बाने मनुष्य तथा अपने धर्म के प्रति कटर रहने पाले और दूसरे के धर्म से देष भाव रसाने वाले मनुष्य दोनों की प्रवृत्ति एक समान ही है । ये दोनों ही प्रकार के मनुष्य अपने निजी स्वार्थ को सर्वोपरि मानते हैं । 

( ख ) लेखक कहता है कि पारन भूमि अनेक संत - महात्माओं की तपोस्थली रही है । इसलिए यह धरती सीर्थ स्थल के समान है । प्राचीन काल में यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य , सामाजिक जीवन एवं सांस्कृतिक परंपराएं उत्कृष्ट थीं । किन्तु जब उन सबका संस हो चुका है । ऐसा प्रतीत होता है कि चंपारन की भूमि अपनी अपार संपत्ति को मूल गई है । 




प्रश्न 13. लेखक ने पाट में विभिन्न जाति के लोगों के विभिन्न स्थानों आकर चंपारन और उसके आसपास बसने का निक किया है । वे कहाँ - कहीं से और किसलिए वहीं आकर बसे। 

उत्तर - लेखक ने स्पष्ट किया है गंपारन में अनेक लोग विभिन्न स्थानों से आकर बसे थे । प्राचीन काल से ही यहाँ आने - जाने वाले लोगों का ताता लगा रहा है । ये मुख्य रूप से यहाँ खेती करने आते थे । बारू नामक जाति राजस्थान से यहाँ आकर मसी यी । दक्षिण बिहार के छोटा नागपुर पठार ते घाँगड़ नामक जाति आई थी । इन जातियों के आने की प्रमुख वजह नील की खेती थी । दक्षिण बिहार के गया जिते की मुईया जाति के लोग भी नील की खेती करने के लिए चंपारन आए थे । 


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प्रश्न 14. पाठ में लेखक नारायण का रूपक रचता है और वह सांग रूपक है । रूपक का पूरा विवरण प्रस्तुत कीजिए|

उत्तर - जब उपमेय पर उपमान का आरोप होता है तब रूपक अलंकार होता है । इस आरोप के दो प्रकार होते हैं - प्रयम अभेदता के द्वारा और द्वितीय तदूपता के द्वारा । इस आधार पर रूपक के दो भेद किए जाते हैं -

( i ) अभेद रूपक तथा ( ii )तदप रूपक । 

 ( i ) अभेद रूपक - अभेद रूपक में उपमेय तथा उपमान में कोई भेद नहीं रहता है । इसके तीन भेद होते हैं 

 ( क ) अधिक अभेद रूपक ( ख ) हीन अभेद रूपक ( ग ) सम अभेद रूपक 

 ( ii ) तद्रूप रूपक - तदूप रूपक में उपमान , उपमेय का रूप धारण तो कर लेता है किन्तु एक नहीं हो पाता । उसे दूसरा काकर व्यक्त करते हैं । इसके भी तीन भेद होते हैं ( क ) अधिक तप रूपक ( ख ) हीन तदूप रूपक ( ग ) सम तदूप रूपक 

 इनके अलावा रूपक के निम्नलिखित तीन भेद और माने जाते हैं ( क ) सांग रूपक ( ख ) निरंग रूपक ( ग ) परंपरित रूपक 

 ( क ) सांग रुपक - जहां पर उपमेय में उपमान का अंगों सहित आरोप होता है , वहीं सांग रूपक पाया जाता है । उदाहरण के लिए , नारि कुमुदिनी अवय सर , रघुबर बिररु दिनेस । अस्त भये विकसित भई , निरखि राम राकेस ।

 ( ख ) निरंग ( नरवयव ) रूपक - जिस स्थान पर संपूर्ण अंगों का साम्य होने की बजाए केवल एक ही अंग का आरोप किया जाता है , वहीं निरंग रूपक पाया जाता है । उदाहरण के लिए , अवसि पलिय बन राम पहे , भरत मंत्र मलकीन । सोक - सिंधु त सबहि , तुम अवलंबन दीन्ह ।। ( ग ) परंपरित रूपक - जहाँ प्रधान रूपक किसी अन्य रूपक पर आस्थित होता है तथा किसी दूसो रूपक की मदद के बिना स्पष्ट नहीं होता है , वहीं परंपरित रूपक होता है । उदाहरण के लिए , सुनिय तासु गुन ग्राम जासु नाम अब - खग बधिकर 



 

प्रश्न 15. नीलहे गोरों और गांधीजी से जुड़े प्रसंगों को अपने शब्दों में लिखिए । 

उत्तर - नीलहे गोरों द्वारा चंपारन के किसानों का भरपूर शोषण किया गया था । वे किसानों से जबल नील की खेती करणे नील की खेती हर छोटे - बड़े किसान के लिए अनिवार्य थी । इससे गोरों को काफी लाभ हुआ तथा उनकी भव्य कोठियां खड़ी हो गई । उनका सामान्य आसपास के इलाकों में भी फैला हुआ था । वे अपनी इच्छानुसार कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र में । तत्कालीन शासन नीलहे गोरों के हय की कठपुतली या । शासन के बड़े - बड़े अफसर भी इन्हीं गोरों की छाया में पल रहे थे । 

गाँधीजी के चंपारन आने से मानो एक बिजली - सी कोय गई । उन्होंने पारन के किसानों की दशा सुधारने तथा पर में शिक्षा को व्यवस्था करने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किए । उन्होंने चंपारन के किसानों में निर्भीकता की , भावना उत्पन्न की तथा उनके हृदय में सत्य की भावना को स्थापित किया । गरीब जन समुदाय की स्थिति को सुधारने के लिए भी गांधीजी ने कई महत्वपूर्ण प्रयास किए । 



 

प्रश्न 16. चोर और मन किसे कहते हैं ? वे कैसे बने और उनमें क्या अंतर है । 

उत्तर - चौर उचले हुए ताल हैं जिनमें सर्दियों और गर्मियों में पानी कम होता है तथा ये खेती में काम आते हैं । मन विशाल तथा गहरे ताल हैं । ' मन ' शब्द मानस का अपभ्रंश है । जब गंडक नदी में बाढ़ आती है तो नदी अपना पथ बदल लेती है । पुराने पच पर कुछ उथले व कुछ गहरे गड्ढे बन जाते हैं जिनसे चौर और मन का निर्माण होता है । इनमें प्रमुख अंतर यह है कि चौर की तुलना में मन ज्यादा गहरे होते हैं ।



प्रश्न 17 , कपिलवस्तु से मगध के जंगलों तक की यात्रा बुद्ध ने किस मार्ग से की थी । 

उत्तर - बुद्ध ने कपिलबस्तु से पंडई नदी के सहारे भिखनाथोरी , भितिहरया , रामपुरवा , नीरिया , भदनगढ़ , अरेराज , केसरिया होते हुए मगध के जंगलों तक की यात्रा पूर्ण की । 




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