Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 13 | गाँव का घर

Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 13 | गाँव का घर



गाँव का घर


    ( 1 )

गाँव के घर के

अंतःपुर की बह चौखट 

टिकुली साटने के लिए सहजन के पेड़ से छुड़ाई गई गोद का गेह 

जिसके भीतर आने से पहले खास कर आना पड़ता था बुजुर्गों को 

खड़ाऊँ खटकानी पड़ती थी खबरदार की 

और प्रायः तो उसके उपर ही रुकना पड़ता था 

एक अदृश्य पर्दे के पार से पुकारना पड़ता था 

किसी को , बगैर नाम लिए 

जिसकी तर्जनी की नोक पारण किए रहती वी सारे काम , सहज , 

शंख के विरू की तरह

 गाँव के पर र की 

 उस चौखट के बगल में 

 गेरू - लिपी भीत पर दूध - डूबे अंगूठे के छापे उटीना दूध लाने वाले बूढ़े ग्वाल दादा के हमारे बचपन के भाल पर दुग्ध - तिलक 

महीने के अंत गिने जाते एक - एक कर 



प्रसंग : प्रस्तुत पद्यांश ज्ञानेंद्रपति द्वारा रचित ' गाँव का घर ' शीर्षक कविता उनके प्रसिद्ध काव्यसंग्रह ' संशयात्मा ' से लिया गया है । कवि बड़े होने के बाद भी अपनी स्मृतियों में ग्राम्य - जीवन का चित्र सजाए हुए है उसे अपने बचपन का वह गाँव , उसकी परंपराएँ , रीति - रिवाज तथा तौर - तरीके अब भी याद हैं । तथा उसका सजीव चित्रण उसने अपनी कविता में किया है । 


व्याख्या : कवि अपने गाँव के पुराने घरों , वहाँ की परंपराओं आदि को याद करते हुआ कहता है कि गांव में घर के आंतरिक भाग के दरवाजे की चौखट पर घर की औरतें टिकुली ( बिंदी ) लगाने के लिए गोंद रखती थीं । इस गोंद को सहजन के पेड़ से छुटाया जाता था । कवि को याद है कि घर की एक सीमा ( सरहद ) होती थी जिसके आगे जाने से पहले घर के बड़े - बुजुर्गों को खाँसना पड़ता था , 

              ताकि घर की औरतों को उनके अंदर आने की सूचना मिल सके । कुछ लोग खांसने की बजाए अपनी खड़ाऊँ खटकाकर अपने आने का संकेत देते थे । कई बार अनजान लोगों को तो इस सीमा रेखा के बाहर ही रुकना पड़ता था । इसी सीमा रेखा पर एक अदृश्य पर्दा सा लगा होता था जहाँ से आवाज देकर किसी को बिना नाम लिए कहना पड़ता था या अँगुली से इशारा करके बताना पड़ता था । ऐसा लगता था मानो यह तर्जनी अंगुली शंख के चित की भांति सारे काम धारण किए हुए है । 

              गाँव के घर में उस चौखट के साथ एक दीवार होती थी जो लाल रंग की खड़िया मिट्टी से पुती होती थी । उस दीवार पर दूध में अंगूठा इबोकर वित बनाये होते थे । ये चिह प्रतिदिन बाहर से दूध लाने वाले ग्वाल दादा के होते थे ये विह हमारे बचपन के मस्तक पर दुग्य - तिलक के होते थे । माहीने के अंत में इन विहों को गिनकर दूप का हिसाब लगा लिया जाता था । 



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        ( 2 )


गाँव का वह घर 

अपना गाँव खो चुका है 

पंचायती राज में जैसे घो गए पंच परमेश्वर 

बिजली - बत्ती आमई कब की , बनी रहने से अधिक गई रहनेवासी 

अबके बिटोआ के दहेज में टी.बी. भी 

लालटेनें हैं अब भी , दिन - भर आलों में कैलेंडरों से टैंकी रात उजाले से अधिक अंधेरा उगलती 

अँधेरे में छोड़ दिए जाने के भाव से भरती 

जबकि चका ! प रोशनी में मदमस्त आर्केस्ट्रा बज रहा है कहीं , बहुत दूर , 

पट पभिड़काए 

कि आवाज भी नहीं आती यहाँ तक , न आवाज की रोशनी , न रोशनी की आवाज 



 प्रसंग ::- पूर्ववत् । कवि ने अपनी स्मृतियों में गाँव के घर का जो रूप संजोया है , आज उसमें उसे अनेक बदलाव नजर आते हैं । वर्तमान के गाँव अपना मौलिक स्वरूप खो चुके है । इसके अलावा गाँवों में आए अन्य बदलावों का भी उल्लेख किया गया है । 

 

व्याख्या ::- कवि कहता है कि लगता है कि आधुनिकता की इस दौड़ में गाँव का वह धर कहीं खो चुका है । गांवों के जिन छोटे - बड़े झगड़ों को पंचायतों में पंच परमेश्वर परस्पर बैठकर सुलझा लेते थे । वे अब न्यायालयों में जाने लगे हैं । ऐसा लगता है कि इस पंचायती राज में पंच परमेश्वर कहीं खो गए हैं । गाँवों में बिजली घर - घर तक पहुंच गई है , परंतु बिजली रहती थोड़ी देर के लिए है पर गायब ज्यादा समय रहती है । इस बार बेटे के विवाह में टी.वी. भी दहेज स्वरूप मिल गया है ।

 घरों में पुराने समय की लालटेने अब भी हैं लेकिन वे केवल दीवारों में बने आलों में रखी रहने के लिए हैं तथा आलों पर कैलेंडर टॉग दिए जाने से ये उनके नीचे देककर रह गई हैं । वे लालटेनें अब रात के अंधकार से भी अधिक काली हो चुकी हैं । शायद उनमें भी अंधेरे में फेंक दिए जाने का भाव भर चुका है । दूसरी तरफ कहीं दूर घर के दरवाजों के किवाड़ बंद कर चकाचौंध कर देने वाली रोशनी में मस्त कर देने वाली धुन के साथ आर्केस्ट्रा बज रहा है ।

                          किन्तु उस आर्केस्ट्रा की न तो आवाज सुनाई पड़ रही है और नहीं उसकी इरलक ही दिखाई दे रही है अर्थात् अब गाँवों में भी अमीर - गरीब के बीच की खाई बढ़ती ही जा रही है । 


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                  ( 3 )

                  

 होरी - चैती विरहा - आल्हा गूंगे 

 लोकगीतों की जन्मभूमि में भटकता है 

 एक शोकगीत अनगाया अनसुना आकाश और अंधेरे को काटते 

दस कोस दूर शहर से आने वाला सर्कस का प्रकाश - बुलौआ 

तो कब का मर चुका है 

कि जैसे गिर गया हो गजदंतों को गवाकर कोई हाथी 

रेते गए उन दाँतों की जरा - सी पवल पूल पर

 छीज रहे जंगल में ,

 लुलने वाले मुंह बोले , शहर में बुलाते हैं बस

 अदालतों और अस्पतालों के फले - फले भी रुपते - गयाले अमित्र परिसर 

 कि जिन बुलोओं से 

 गाँव के घर की रीढ़ झूरझूराती है 

 

 प्रसंग ::- पूर्वक्ता यहाँ कवि कहता है कि उसने अपने बचपन में गांव और घरों का जो रूप देशा था , आज उसमें काफी बदलाव आ चुके हैं । गाँवों से अनेक परंपराएँ गायब हो चुकी है । गावों का स्वस्थ प्राकृतिक वातावरण विभिन्न कारणों से प्रदूषित होता जा रहा है । इसके साथ - साथ कवि ने शहर की विकृति एवं अमानवीय प्रवृत्ति का भी उल्लेख किया है । 

 

व्याख्या : कवि कहता है कि गाँवों में विभिन्न ऋतुओं , महीनों या त्योहखरों पर कुछ विशेष लोकगीत जैसे होरी - वैती , बिरहा - आल्हा आदि गाए जाते थे , वे जब खामोश हो चुके हैं । जिन गांवों में इन लोकगीतों का जन्म हुआ , वे गाँव अब सुनसान पड़े हैं । ऐसा लगता है कि जैसे यहाँ अनसुना या अनगाया शोकगीत भटक रहा है । शहर में सर्कस लगने पर दस कोस की दूरी पर स्थित जो प्रकाश आकाश और अंधकार को चीरकर आता हुआ लोगों को सर्कस में आने का बुलावा देता प्रतीत होता था , वह तो कब का मर चुका है । 

अब सर्कस के उस प्रकाश का कोई अता - पता नहीं है । यह उसी तरह गायब हो चुका है जैसे कोई हाथी अपने गजदतों को गिराकर धरती पर गिर गया है । उन दाँतो को रेतने से निकली सफेद पूल जंगलों पर छा गई है तथा इन्हें नष्ट कर रही है । अर्थात् जंगारों को काटकर उनका शहरीकरण किया जा रहा है । वर्तमान में अदालतों तथा अस्पतालों का वातावरण भी दूषित हो चुका है । इन दुष्प्रभावों के चल के लोग निष्तेज एवं दुर्बल हो चुके हैं । गाँव के परों की आस्था , मूल्य एवं परंपराएं नष्ट होने के करीब पहुंच चुकी हैं । 



 Board Class 12th Hindi Book Solutions पद्य :--

1. कड़बक

2. पद सूरदास

3. पद तुलसीदास

4.छप्पय 

5.कविप्त 

6. तुमुल कोलाहल कलह में 

7. पुत्र वियोग 

8.उषा

10.अधिनायक 

11.प्यारे नन्हें बेटे

12. हार जित

13. गांव का घर




Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 13 | गाँव का घर

  

प्रश्न 1. कवि की स्मृति में ' घर का चौस्त्रट ' इतना जीचित क्यों है । 

उत्तर - कवि को स्मृति में ' घर का चौखट ' इतना जीवित इसलिए है क्योंकि उसने अपना बचपन इसी घर में गुजारा है जोर व्यक्त्ति के लिए अपनी जन्म भूमि से लगाव होना स्वाभाविक बात है । लेखक को याद है कि घर की यह चौखट अंतःपुर की सीमा निर्धारित करती थी जहाँ पर बड़े - बुजुर्गों को ठहरकर या विशेष संकेत करके ही अंदर जाना पड़ता था । इसी चौखट पर घर की महिलाएं सहजन का गोंद सगाकर रखती थी जिससे वे अपनी विदिया चिपका सके । बड़े - बुजुर्ग इसी चौखट पर खड़े होकर तर्जनी अंगुली के इशारे से अपनी कहते थे , काम कराते हैं । इस चौखट की बगल में गेरू पुती दीवार होती थी जिस पर दूध में एवं अंगूठे के निशान बने होते थे जिन्हें ग्वाल दादा महीने में एक बार गिनकर दूध का हिसाब लगाते थे । इस प्रकार इस चौतर से जुड़ी ये सारी वादे लेखक के मन में जीवित हैं । 

 

प्रश्न 2. ' पंच परमेश्वर ' के खो जाने को लेकर कवि घितिल क्यों है ? 

उत्तर - गावों में यह माना जाता है कि ' पंच ' परमेश्वर का रूप होता है । पंच के पद पर आसीन व्यक्ति अपने दायित्व के प्रति पूर्ण सचेष्ठ एवं सतर्क रहते हुए निष्पक्षता के साथ न्याय करता है । सम्बन्धित व्यक्तियों की उस पर पूर्ण आस्था रहती है । कवि यह देखकर चिंतित है कि आधुनिक पंचायती राज व्यवस्था के इस दौर में पंच - परमेश्वर की सार्थकता समाप्त हो गई है । अन्याय और अनैतिकता ने इस व्यवस्था को लगभग निष्क्रिय कर दिया है । पंच परमेश्वर शब्द अपनी सार्थकता खो चुका है । जो छोटे - मोटे विवाद पहले गांव की पंचायत में सुलझ जाते थे , वे अब न्यायालयों तक जाने लगे हैं । कपि यही सब देखकर चिंतित है । 




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