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Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 8 / usha padya khand

 

 Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 8 / usha padya khand


शमशेर बहादुर सिंह 

कवि - परिचय:- 

जीवन - परिचय :-- सतत प्रयोगचमी श्रेष्ठ प्रगतिशील कवि शमशेर बहादुर सिंह का जन्म 9 जनवरी 1911 के देहरादून , उत्तराखंड में हुआ । इनकी माता का नाम प्रभुदेई तथा पिता का नाम तारीफ सिंह था । इनके पिता कलेक्ट्रिएट में रीडर के पद पर थे तथा साहित्य प्रेमी व्यक्ति थे । शमशेर जी ने सन् 1928 में हाई स्कूल , 1991 में इंटर , 1953 में इलाहाबाद से बीए . 

                                तथा 1938 में एम.ए. ( पूर्वार्ध , अंग्रेजी ) पास की । इसके बाद उन्हें अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी । सन् 1929 में इनका विवाह धर्म देवी से हुआ , किन्तु 1999 में इनकी पत्नी की मृत्यु हो गई । शेष जिंदगी इन्होंने परिवार विहीन एवं अनिश्चित जीवन जीया ।    

Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions गद्य :----

               इन्होंने रूपाभ , कहानी , माया , नया साहित्य , नया पथ तथा मनोहर कहानियों आदि पत्रिकाओं का संपादन कार्य किया । इन्होंने उर्दू - हिन्दी कोश का संपादन भी किया । ये 1981-85 तक उज्जैन के ' प्रेमचंद नृजनपीठ ' विक्रम विश्व विद्यालय के अध्यक्ष रहे । सन् 1978 में इन्होंने सोवियत रूस की यात्रा भी की थी । सन् 1999 में इस प्रतिभाशाली लेखक का निधन हो गया । 


साहित्यिक रचनाएँ : - दूसरा सप्तक ( 1951 ) , कुछ कविताएँ ( 1969 ) , कुछ और कविताएँ ( 1961 ) , चुका भी नहीं हूँ में ( 1978 ) , इतने पास अपने ( 1980 ) , उदिता ( 1980 ) , बात बोलेगी ( 1981 ) , काल तुझसे होड़ है मेरी ( 1982 ) , टूटी हुई बिखरी हुई , कहीं बहुत दूर से सुन रहा हूँ , सुकून की तलाश ( गजल ) , प्रतिनिधि कविताएँ ( संपादक डा . नामवर सिंह ) । इसके अलावा उनकी डायरी , विविध प्रकार के निबंध एवं आलोचना भी फुटकर रूप में प्रकाशित हुए । 


काव्यगत विशेषताएँ : - शमशेर बहादुर सिंह को आधुनिक हिन्दी कविता में स्वच्छंद चेतना के प्रगतिशील कवि के रूप में जाना जाता है । उन्होंने लेखन कार्य तो तीस के दशक में ही शुरू कर दिया था पर उनको | कविताएं पुस्तकाकार में सदी के उत्तरार्थ में ही आनी शुरू हुई । कवि एवं काव्य के स्वभाव एवं आग्रहों के कारण | 

                  उनके लेखन में विशिष्टता का निरूपण हुआ । उन्होंने अपनी सृजनात्मकता से प्रगतिवाद , स्वच्छंदबाद , प्रयोगवाद , नई कविता तथा वस्तुवादी यथार्थवाद एवं कलाबादी रूपवाद , इन सबका ऐसा विलक्षण घोल तैयार किया जिसमें | 

इनकी सीमाएं नहीं , अपितु शक्तियों मुखरित हुई । उन्होंने कविता , चित्र , संगीत , नाटक , नृत्य , मूर्ति आदि विविध | कलाओं के सृजनात्मक प्रभाव अपनी कविता में ग्रहण किए । उनकी रचनाओं में अद्भुत कला संयम , संक्षिप्तता | तथा सांकेतिकता का समावेश मिलता है । 


भाषागत विशेषताएँ: - शमशेर बहादुर सिंह की काव्य भाषा तत्सम शब्दावलीयुक्त खड़ी बोली है । उनकी | रचनाओं में हिन्दी के साथ साथ उर्दू तथा अंग्रेजी के शब्दों का भी काफी प्रयोग नजर आता है । 

           इनकी रचनाओं में हिन्दी , उर्दू तथा अंग्रेजी काव्य पर परंपराओं का निर्वाह हुआ है । शमशेर जी की रचनाओं में काव्य विन्यास विविधतापूर्ण है तथा काव्य की भाषा सहज , सरल , सरस तथा भावाभिव्यक्ति में सक्षम है । शमशेर बहादुर सिंह द्वारा रचित प्रस्तुत कविता ' उषा ' में कवि ने गतिशील बिंब चित्रण द्वारा उषा का वर्णन किया है । उपा में एक जादू है . जिसमें विमुग्ध - तल्लीन कवि दृष्टि उसके साथ - साथ चलती है तथा उसे अपने मानस में समाहित करती है ।



Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 8 / usha padya khand


           उषा 

                 ( 1 ) 

 प्रात नम या बहुत नीता शंख जैसे 

 भोर का नभ

 राब से सीपा हुआ धोका 

 ( अभी गीला पड़ा है ) 

 बहुत काली सिल जरा सेलाल केसर से 

 कि जैसे पुल गई हो 

 स्तर पर या सात बड़िया चाक 

 मत दी हो किसी ने 

 

 प्रसंग : प्रस्तुत पयांश प्रसिद्ध प्रगतिशील कवि शमशेर बहादुर सिंह द्वारा रचित कविता ' उषा ' से लिया गया है । उपरोक्त पक्तियों में कवि ने गतिशील चित्रण बिंबों द्वारा उपाकालीन नम का सुन्दर चित्र प्रस्तुत किया है । कवि ने विभिन्न उपमानों द्वारा उषाकालीन नभ की पवित्रता एवं उज्ज्वलता की उपमा दी है । 

व्याख्या : कवि प्रातःकालीन नभ के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन करते हुए करता है कि प्रातःकालीन आकाश शल की तरह नीला तथा पवित्र नजर आ रहा था । वह किसी सुपड़ गृहिणी द्वारा राख से लीपे गए चौके की तरह लग रहा या जो अभी तक गीला हो तथा सूखा नहीं हो । 

जिस तरह से गीले आँगन और चौके पर किसी को चलने - फिरने नहीं दिया जाता है ताकि उस पर पैरों के निशान न पड़ें और वह साफ - स्वच्छ बना रहे , उसी प्रकार आकाश भी एकदम स्वछ और दाग - धब्बों से रहित दिखाई दे रहा था । 

पूरब दिशा में सूर्योदय की लालिमा के कारण आकाश ऐसा लग रहा था जैसे मसाला पीसने वाली काली सिल को लाल केसर से घो दिया गया हो या फिर किसी ने काली स्लेट पर लाल रंग की खड़िया ( चाक ) मल दी हो जिससे स्लेट का रंग भी लाल हो गया हो । 



Board Class 12th Hindi Book Solutions पद्य :--

1. कड़बक

2. पद सूरदास

3. पद तुलसीदास

4.छप्पय 

5.कविप्त 

6. तुमुल कोलाहल कलह में 

7. पुत्र वियोग 

8.उषा

10.अधिनायक 

11.प्यारे नन्हें बेटे

12. हार जित

13. गांव का घर 



                   ( 2 ) 

नील जल में या किसी की 

गौर झिलमिल देह 

जैसे हिल रही हो । 

और .... 

जादू टूटता है इस उषा का अब 

सूर्योदय हो रहा है । 


प्रसंग : प्रस्तुत पद्यांश प्रसिद्ध प्रगतिशील कवि शमशेर बहादुर सिंह द्वारा रचित कविता ' उपा ' से लिया गया है । इन पक्तियों में कवि बताते हैं कि उषाकाल में आकाश का सौंदर्य बढ़ गया है । 

आकाश का रूप विशिष्ट हो गया है । प्रभातकालीन आकाश की इस अद्भुत सुंदरता का वर्णन अनेक रूपों में किया गया है । 


ब्याख्या : कवि प्रातःकालीन आकाश के विषय में विभिन्न प्रकार की कल्पनाएँ कर रहा है । 

यह कहता है कि सूर्योदय से पूर्व उसकी लालिमा के कारण आकाश का रंग बदला हुआ है तथा वह ऐसा लग रहा है जैसे नीले जल में नहाती किसी सुंदरी का गोरा शरीर अपनी आभा बिखेर रहा हो । 

किन्तु अब सूर्योदय का समय हो रहा है , इसलिए ज्या का यह जादू समाप्त हो जा रहा है । 

सूर्योदय के साथ ही सूर्य का प्रकाश फैल जाता है जिससे उषा रूपी सुंदरी की वह तालिमा तथा नीलिमा युक्त अद्भुत शोभा कम होती जाती है । 


Board Class 12th Hindi Book Solutions पद्य :--

1. कड़बक

2. पद सूरदास

3. पद तुलसीदास

4.छप्पय 

5.कविप्त 

6. तुमुल कोलाहल कलह में 

7. पुत्र वियोग 

8.उषा

10.अधिनायक 

11.प्यारे नन्हें बेटे

12. हार जित

13. गांव का घर




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