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KADBAK KA ARTH // कड़बक कविता का अर्थ // Kadbak by Malik Mohmmad Jayasi

 

KADBAK KA ARTH // कड़बक कविता का अर्थ // Kadbak by Malik Mohmmad Jayasi 

Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions गद्य :----



                कड़बक

                          ( 1 ) 

एक नैन कवि मुहमद गुनी । सोइ बिमोहा जेई कवि सुनी ।

 चाँद जइस जग विधि औतारा । दीन्ह कलंक कोन्ह उजिआरा ।

जग सुझा एकड नाहीं । उवा सूक अस नखतन माहाँ । 

जी लहि अंबहि डाभ न होई । तौ लहि सुगंध बसाइ न सोई ।

कीन्ह समुद्र पानि जौं खारा ती अति भएठ असूक्ष अपारा ।

जौं सुमेरु तिरसूल विनासा । भा कंचनगिरि लाग अकासा ।

जौं लहि घरी कलंक न परा । कब होईनहिं कंचन करा ।

एक नैन जस दरपन औ तेहि निरमल भाठ । 

सब रूपवंत गहि मुख जोवहि कड़ चाउ ।।


 प्रसंग : = प्रस्तुत पद्यांश मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य ' पद्मावत ' के ' स्तुति - खंड ' से उद्घृत है । इस पद्यांश में कवि ने आत्म - परिचय प्रस्तुत करते हुए अपनी उन विशेषताओं का वर्णन किया है जो उसे एक विशिष्ट व्यक्ति बनाती हैं । 

  

व्याख्याः= कवि मलिक मुहम्मद जायसी एक नेत्र वालें होते हुए भी अत्यधिक गुणवान हैं । उनकी कविता में ऐसा प्रभाव है कि जो भी उसे सुनता है , वही मंत्रमुग्ध हो जाता है । कवि जायसी को भगवान ने इस संसार में चन्द्रमा की भौति अवतरित किया है । जिस प्रकार चन्द्रमा में कलंक , फिर भी वह जगत में अपना प्रकाश वितरित करता रहता है उसी प्रकार कवि जायसी भी एक आँख खराब होने के बावजूद उत्तम काव्य - रचना करते हैं ।

उन्होंने इस संपूर्ण जगत को एक नेत्र से ही भली - भाँति समझ लिया है । जिस प्रकार शुक्र नामक तारा जब निकलता है तो अन्य तारों की कॉति फीकी । पड़ जाती है उसी प्रकार ये भी साहित्य - नागन के शुक्र तारा हैं तथा अन्य कवियों के मध्य उनका तेज अलग ही नजर आता है । कवि जायसी कहते हैं कि जब तक आम में मंजरी नहीं फूटती तब तक उसमें मधुर सौरभ का अभिनिवेश नहीं होता । 

समुद्र का जल खारा होता है , किन्तु उसका यही एक दोष उसे असूझ और असीम बनाता है उसी तरह से कवि का काव्य भी गंभीर और व्यापक है । जब भगवान शंकर ने सुमेरु पर्वत को अपने त्रिशूल से नष्ट किया था तो वह त्रिशूल का स्पर्श पाकर स्वर्ण का बन गया तथा आकाश को छूने लगा था । जब तक सोने को शुद्ध करने के लिए मिट्टी के पात्र में डालकर तपाया नहीं जाता तब तक यह कच्चा ( अशुद्ध ) ही रहता है । 

कवि मुहम्मद जायसी गर्वपूर्वक कहते हैं कि एक नेत्र होते हुए भी वह दर्पण के समान स्वच्छ एवं निर्मल भावो से ओत - प्रोत हैं । उनके इन निर्मल भावों को देखकर ही बड़े - बड़े रूपवान लोग उनके चरण पकड़कर उनके मुख के तरफ एक लालसा के साथ ताका करते हैं । 



Board Class 12th Hindi Book Solutions पद्य :--

1. कड़बक

2. पद सूरदास

3. पद तुलसीदास

4.छप्पय 

5.कविप्त 

6. तुमुल कोलाहल कलह में 

7. पुत्र वियोग 

8.उषा

10.अधिनायक 

11.प्यारे नन्हें बेटे

12. हार जित

13. गांव का घर        



     ( 2 ) 

मुहमद यहि कबि जोरि सुनावा । सुना जो पेम पीर गा पावा|

जोरी लाइ रकत के लेई । गाढ़ी प्रीति नैन जल भेई । 

औ मन जानि कबित अस कीन्हा । मक यह रहै जगत महँ चीन्हा । 

कहाँ सो रतनसेनि अस राजा । कहाँ सुवा असि बुधि उपराजा ।

 कहाँ अलाउद्दीन सुलतानू । कहँ राघौ जेई कीन्ह बखानू । 

कहाँ सुरूप पदुमावति रानी । कोइ न रह्य जग रही कहानी ।

पनि सो पुरुष जस कीरति जासू । फूल मरे पै मरे न बासू ।

केई . न जगत जस बंधा केई न लीन्ह जस मोल

जो यह पद कहानी हम संवरे दुइ बोल ।।


 प्रसंग : = प्रस्तुत पद्यांश मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य ' पद्मावत ' के ' उपसंहार खंड ' से अवतरित है । इस खंड में कवि इस तथ्य को उद्घटित करते हैं कि उसने रत्नसेन , पद्मावती आदि जिन पात्रों को लेकर ' पद्मावत ग्रंथ की रचना की है , वास्तव में उन पात्रों का कोई अस्तित्व नहीं था । इस दुनिया में केवल उनकी कहानी प्रचलित रही है ।

 

व्याख्या : = कवि जायसी कहते हैं कि मैंने इस काव्य को रचकर सुनाया है तथा जिसने भी इस काव्य को सुना आसूओं से इसकी गाड़ी प्रीति को भिगोया है । मैंने अपने मन में यह विचार करके इस ग्रंथ को लिखा है कि कदाचित दुनिया में मेरी वही निशानी बाकी रह जाएगी । कहाँ है वह रत्नसेन जैसा राजा , कहाँ है वह तोता ,

 जो अद्भुत बुद्धि वाला था ? कहाँ है वह सुल्तान अलाउद्दीन तथा कहाँ है वह राधव चेतन जिसने अलाउद्दीन के समक्ष पद्मावती के रूप सौन्दर्य का वर्णन किया था ? कहाँ है वह लावण्य से भरपूर सुन्दर रानी पद्मावती ? इनमें से कोई भी इस संसार में नहीं बचा है , केवल उनकी कहानियों शेष रह गई हैं । केवल वही पुरुष धन्य है जिसकी कीर्ति तथा यश सदैव विद्यमान रहते हैं । फूल शाखा से टूट जाता है लेकिन उसकी सुगंध समाप्त नहीं होती है । उसी प्रकार मनुष्य का यश भी सदैव जीवित रहता है । 

कवि जायसी कहते हैं कि इस जगत में न तो किसी ने अपना यश बेचा है और न ही वह यश को मूल्य देकर खरीद ही पाया है । मेरी तो केवल यही इच्छा है कि जो भी इस कहानी को पढ़े वह दो शब्दों में मुझे भी याद कर ले । कवि का भाव यह है कि लोग उसे कहकर याद रखें कि कवि ने प्रेम की पीर से भरपूर सुन्दर काव्य की रचना की है


 कड़बक अभ्यास:---

प्रश्न 1. कवि ने अपनी एक आँख की तुलना दर्पण से क्यों की है ? 

उत्तर - कवि जायसी अपनी एक आँख की तुलना दर्पण से करता है क्योंकि जिस प्रकार दर्पण स्वच्छ तथा निर्मल होता है तथा कोई भी व्यक्ति अपनी छवि उसमें साफ एवं स्पष्ट रूप से देख पाता है , ठीक उसी प्रकार कवि की आँख भी स्वच्छता एवं पारदर्शिता की प्रतीक है । कवि एक आँख वाला होकर भी अद्भुत काव्य - प्रतिभा से युक्त है , इसी कारण वह पूजनीय एवं वंदनीय है । उसकी निर्मल वाणी समस्त जनमानस को प्रभावित करती है । जैसी छबि होती है दर्पण में वैसा ही प्रतिबिंब उभरता है । ठीक उसी प्रकार कवि की निर्मलता तथा लोक कल्याणकारी भावना उनकी कविताओं में दृष्टिगत होती हैं ।


 प्रश्न 2. पहले कड़बक में कलंक , काँच और कंचन से क्या तात्पर्य है ?

 उत्तर - कवि मुहम्मद जायसी का मानना है कि ईश्वर ने उसे संसार में चन्द्रमा की भाँति जन्म दिया है । जिस प्रकार चन्द्रमा में कलंक है , फिर भी वह अपने प्रकाश से जगत को प्रकाशित करता है , उसी प्रकार कवि भी एक आँख खराब होने के बावजूद श्रेष्ठ काव्य की रचना करता है । ' काँच ' शब्द से कवि का तात्पर्य है - कच्ची धातु । कवि कहता है कि जब तक सोने को शुद्ध किए जाने के लिए तपाने वाले पात्र में डालकर तपाया नहीं जाता तब तक वह कच्चा ( अशुद्ध ) ही रहता है , अर्थात् शुद्ध सोना नहीं बन पाता । कदि का कवन से तात्पर्य है - शुद्ध सोना । कवि कहता है कि उसने अपने काव्य को श्रेष्ठ बनाने के लिए स्वयं को खूब तपाया है । 

 

प्रश्न 3. पहले कड़वक में व्यंजित जायसी के आत्मविश्वास का परिचय अपने शब्दों में दें ।

उत्तर - प्रथम कड़वक में कवि जायसी पूर्ण आत्मविश्वास के साय कहते हैं कि एक नेत्र वाले होते हुए भी उनमें गुणों का भाव नहीं है । उनकी कविता में ऐसा प्रभाव है कि जो भी उसे सुनता है वह मंत्रमुग्ध हो उठता है । ईश्वर ने उन्हें चन्द्रमा की बाँति इस धरती पर अवतरित किया है । उनमें भी चन्द्रमा की तरह कलंक है कि वह एक नेत्र वाला है , फिर भी वह दर्पण के हमान स्वच्छ व निर्मल भावों से ओत - प्रोत हैं । 




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