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Bihar board 12th hindi solution chapter 6 / तुमुल कोलाहल कलह में

 

Bihar board 12th hindi solution chapter 6 / तुमुल कोलाहल कलह में 


 कवि - परिचय :--

जीवन - परिचय :- आधुनिक हिन्दी की स्वच्छ काव्यधारा के अंतर्गत छायावादी काव्य प्रवाह के प्रवर्तकों में से एक जयशंकर प्रसाद का जन्म 1889 ( माघ शुक्ल दशमी , संवत् 1946 ) में वाराणसी में हुआ । इनके पिता का नाम देवी प्रसाद साहु था । सुरती ( तंबाकू ) बनाने के कारण इनका परिवार सूंघनी साहू ' के नाम से विख्यात था । इन्होंने आठवीं तक की शिक्षा प्राप्त की| घर पर नियुक्त शिक्षकों द्वारा संस्कृत , हिन्दी,फारसी तथा उर्दू की शिक्षा प्राप्त की।       

12 वर्ष की आयु में उनके पिता का देहांत हो गया तथा दो वर्ष बाद माता की भी मृत्यु हो गई । परिवार में गृहकलह की स्थिति थी । 

बड़े भाई शंभु रतन की मृत्यु के बाद घर की पूरी जिम्मेवारी प्रसाद जी के कंधों पर आ गई । उनकी प्ररेणा से 1909 में उनके भांजे अंबिका प्रसाद ने ' इंदु ' पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया । इन्होंने कलाधर उपनाम से ब्रजभाषा में सवैयों की भी रचना की । 15 नवंबर , 1937 को इनका निधन हो गया । 

Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions गद्य :----

Bihar board 12th hindi solution chapter 6 / तुमुल कोलाहल कलह में 



 कवि - परिचय :--

जीवन - परिचय :- आधुनिक हिन्दी की स्वच्छ काव्यधारा के अंतर्गत छायावादी काव्य प्रवाह के प्रवर्तकों में से एक जयशंकर प्रसाद का जन्म 1889 ( माघ शुक्ल दशमी , संवत् 1946 ) में वाराणसी में हुआ । इनके पिता का नाम देवी प्रसाद साहु था । सुरती ( तंबाकू ) बनाने के कारण इनका परिवार सूंघनी साहू ' के नाम से विख्यात था । इन्होंने आठवीं तक की शिक्षा प्राप्त की| घर पर नियुक्त शिक्षकों द्वारा संस्कृत , हिन्दी,फारसी तथा उर्दू की शिक्षा प्राप्त की।       

12 वर्ष की आयु में उनके पिता का देहांत हो गया तथा दो वर्ष बाद माता की भी मृत्यु हो गई । परिवार में गृहकलह की स्थिति थी । 

बड़े भाई शंभु रतन की मृत्यु के बाद घर की पूरी जिम्मेवारी प्रसाद जी के कंधों पर आ गई । उनकी प्ररेणा से 1909 में उनके भांजे अंबिका प्रसाद ने ' इंदु ' पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया । इन्होंने कलाधर उपनाम से ब्रजभाषा में सवैयों की भी रचना की । 15 नवंबर , 1937 को इनका निधन हो गया । 

Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions गद्य :----

साहित्यिक रचनाएँ :-- चित्राधार उनका प्रथम संग्रह माना जाता है जिसमें कविता , कहानी , नाटक आदि रचनाएँ संकलित हैं । ( क ) नाटक - कल्याणी परिणय ( 1912 ) , प्रायश्चित ( 1914 ) , राज्यश्री ( 1915 ) , जन्मेजय का नागयज्ञ ( 1926 ) , स्कंदगुप्त ( 1926 ) , कामना ( 1927 ) , एक बूंट ( 1928 ) , विशाख ( 1929 ) , चंद्रगुप्त ( 1931 ) , ध्रुवस्वामिनी ( 1933 ) । ( ख ) कथा संग्रह - छाया ( 1912 ) , प्रतिध्वनि ( 1931 ) , इंद्रजाल ( 1936 ) । ( ग ) काव्य संकलन - झरना ( 1918 ) , आँसू ( 1925 ) , लहर ( 1933 ) । ( घ ) प्रबंध काव्य - कामायनी ( 1936 ) ( ङ ) उपन्यास - कंकाल ( 1929 ) , तितली ( 1934 ) , इरावती ( 1940 , अपूर्ण ) । 


 अतुकांत रचनाएँ :- महाराणा का महत्त्व , करुणालय , प्रेम पथिक ।


Board Class 12th Hindi Book Solutions पद्य :--

1. कड़बक

2. पद सूरदास

3. पद तुलसीदास

4.छप्पय 

5.कविप्त 

6. तुमुल कोलाहल कलह में 

7. पुत्र वियोग 

8.उषा

10.अधिनायक 

11.प्यारे नन्हें बेटे

12. हार जित

13. गांव का घर


Bihar board 12th hindi solution chapter 6 / तुमुल कोलाहल कलह में 


           ( 1 )

तुमुल कोलाहल कतह में 

मैं उदय की बात रे मना 

विकल होकर नित्य चंचल , 

खोजती नींद के पल : 

चेतना वक सी रही तब , 

मैं मलय की वात रे मन ! 

चिर - विषाद विलीन मन की 

इस व्यवा के तिमिर बन की ; 

में उषा सी ज्योति रेखा , 

कुसुम विकसित प्रातरे मन ! 



प्रसंग :-- प्रस्तुत पयांश प्रसिद्ध छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ' कामायनी के निर्वेद सर्ग ' से अवतरित है । कवि जयशंकर प्रसाद ने अपने महाकाव्य ' कामायनी ' में श्रद्धा व मनु की पौराणिक गाथा का वर्णन किया है । निर्वेद सर्ग में दर्शाया गया है कि इड़ा के राजमहल में मनु मूचित हुए पड़े हैं । तभी इड़ा को एक विरहिणी की दूर ले आती विकल प्यनि सुनाई पड़ती है । वह बच्चे के साथ उसी राजभवन की तरफ आ रही थी । वह बद्धा थी । जब उसने मनु को मूछित देखा तो वह असीम व्यया से भर गई । उसने मनु को सहलाना प्रारंभ किया जिससे उनकी मुला दूर हो गई । यह देखकर श्रद्धा अति प्रसन्न हुई । 


व्याख्या :-- मन् को प्राप्त करने बाद श्रद्धा आनन्द - विभोर हो जाती है तथा गाते हुए कहती है कि में भयंकर कोलाहल और झगड़े के वातावरण में हृदय की बात हूँ । अर्थात् में भावनाओं के कोलाहल और कलह को शांत करने वाली हूँ । जब चेतना नित्य दुःखी तया चंचल होकर यकी - सी बनकर नींद के क्षण खोजती है , तब मैं मलय पर्वत से चलने वाली सुगंधित पवन के समान उस थकी हुई चेतना को विधान प्रदान करती हूँ । हे प्रिय मनु ' में निरंतर दुख में डूबे हुए मन और व्यया के अंधकार से पूर्ण वन के लिए प्रातःकालीन ऊपा की तरह प्रकाश रेखा तथा खिले हुए पुष्पों से भरे हुए प्रातःकाल के समान हूँ । 



           ( 2 )

           

जहाँ मरु ज्वाला वयकती , 

चातकी कन को तरसती ; 

उन्हीं जीवन घाटियों की , 

में बरसात रे मन ! 

पवन की प्राचीर में रुक , 

जला जीवन जा रहा झुक ; 

इस घुलसते विश्व - वन की . 

में कुसुम ऋतु रात रे मन ! 

घिर निराशा नीरघर से , 

प्रतिच्छायित अयु सर में ;


प्रसंग : प्रस्तुत पद्यांश प्रसिद्ध छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ' कामायनी ' के निर्वेद सर्ग से अवतरित है । 

व्याख्या :-- मनु को पा लेने के पश्चात् श्रद्धा आनन्द - विभोर जाती है तथा कहती है कि हे मनु ! उन जिन मरु प्रदेशों में सदैव गर्मी की आग धधकती रहती है तथा जहाँ चातकी पानी की एक - एक बूंद के लिए तरसती रहती है , मैं उन मरु प्रदेशों में जीवन घाटियों की पानी से भरी बरसात हूँ । हे मेरे मन ! जब जीवन पवन की चारदीवारी में बंद होकर जलकर झुक जाता है , तब इस झुलसते हुए विश्व में मैं वसन्त ऋतु के समान हूँ , 

                   अर्थात् मैं ज्वाला में धधकते हुए जगत् को शांति प्रदान करने वाली हूँ । श्रद्धा आगे कहती है कि रे मन ! मैं गहन निराशा के बादलों से घिरे आँसुओं के तालाब में करुणा से पूर्ण कमल की तरह हूँ जिस पर भौरे सदैव गूंजते रहते हैं तथा वे खिलकर पुष्प - रस वितरित करते रहते हैं ।

Board Class 12th Hindi Book Solutions पद्य :--

1. कड़बक

2. पद सूरदास

3. पद तुलसीदास

4.छप्पय 

5.कविप्त 

6. तुमुल कोलाहल कलह में 

7. पुत्र वियोग 

8.उषा

10.अधिनायक 

11.प्यारे नन्हें बेटे

12. हार जित

13. गांव का घर



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