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तुलसीदास के पद // Tulsidas ke pad class 12

 

तुलसीदास के पद // Tulsidas ke pad class 12





तुलसीदास कवि:-


परिचय जीवन :  - हिन्दी की शीर्षस्य जातीय महावि गोस्वामी तुलसीदास का जन्म सन् 1549 में उसर प्रदेश के मौदा जिले में राजापुर नमक में हुआ । इनके बचपन का नाम रामबोला था । इनकी माता का नाम हुलसी तथा पिता का नाम आत्माराम दुबे या । मूल नक्षत्र में पैदा होने के कारण अशुभ मानकर इनके माता - पिता ने इन्हें बचपन में ही त्याग दिया था । इसके बाद थुनियो नामक औरत ने इनका पालन पोषण किया । सुकरशेत के रहने वाले बाथा नरहरि दास ने इन | शिक्षा दीक्षा प्रदान की । इन्होंने काशी के विद्वान शेष सनातन के पास के वर्षों तक वेदो , पाइदर्शन , इतिहास , पुराण स्मृतियों , काव्य आदि की शिक्षा प्राप्त की । दीनबंधु पाठक ने इनके व्यक्तित्व एवं यक्तता से प्रभावित होकर अपने पत्री रत्नावली से इनका विवाह कर दिया । रलावली ने अपने प्रति अत्यधिक आसक्ति के कारण इनकार जिससे इनके मन में वैराग्य उत्पन्न हुजा तथा इन्होंने गृहत्याग कर दिया । काशीवास करते हुए ही इनाने भारत के कई प्रमुख तीर्थस्थानों की यात्राएँ भी की । तुलसीदास विनम्र , मृदुभाषी , गंभीर एवं शांत स्वभाव के व्यक्ति के अब्दुर्ररहीम खानखाना , महाराजा मानसिंह , नाभादास , दार्शनिक मधुसूदन सरस्वती , टोडरमल आदि इनके परम मि एवं स्नेही में से ये । 
1623 को श्रावण शुक्ल सप्तमी के दिन इस महान संत कवि का देहांत हो गया । 

रचनाएँ :- माना जाता है कि तुलसीदास ने अनेक ग्रंथों की रचना की थी । पर उनमें से निम्न रचनाए । प्रामाणिक सिद्ध हुई रामलला नहरू , वैराग्य संदीपिनी , बरवै रामायण , पार्वतीभगत , जानकी मगर रामाज्ञाप्रश्न , दोहावली . कवितावली , गीतावली , श्रीकृष्ण गीतावली . रामचरितमानस तथा विनय पत्रिका - पाली रचना हनुमान बाहुक ' को कवितावली का ही अंश माना जाता है । रामचरितमानस तुलसी का सब बृहद् एवं सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य है जिसकी रचना में कुल 2 वर्ष , 7 माह , 26 दिन लगे थे । 

काव्यगत विशेषताएँ: -  सार्वभौम काव्य प्रतिभा संपन्न महाकवि तुलसीदास पर तथा इनके काव्य पर समाज साहित्य जगत एवं हिन्दी भाषा को बहुत गर्व है । तुलसीदास हिन्दी के मध्यकालीन भक्तिकालय को सगुन भक्ति - धारा की रामभक्ति शाखा के प्रधान कवि हैं । तुलसी के काव्य में लोक जीवन के व्यापक , बहुविध अंतर ज्ञान और अनुभव की अभिव्यक्ति हुई है । उनकी संवेदना गहन और अपरिमित थी । उनमें इतिहास एवं संस्कृति का व्यापक परिप्रेक्ष्य बोध और लोकप्रज्ञा थी । भक्तिभावना की दृष्टि से तुलसी ने समन्वयकारी दृष्टि का परिचा दिया है । 

तुलसीदास के पद अर्थ सहित – Tulsidas Ke Pad Class 12 Summary


             ( 1 ) 

 

कबहुँक अंब अवसर पाइ । 

मेरिओ सुमि चाइबी कछु करुन - कया चलाइ ।। 

दीन , सब अंगहीन , छीन , मलीन , अपी अघाइ । 

नाम ले भरै उदर एक प्रभु - दासी - दास कहाइ ।। 

वृझिहें ' सो है कौन ' , कहिबी नाम दसा जनाइ । 

सुनत रामकृपालु के मेरी बिगारिओ बनि जाइ ।। 

जानकी जगजननि जन की किए बधन - सहाइ । 

तरौ तुलसीदास भव तव - नाथ - गुन - गन गाइ ।। 


प्रसंग : = प्रस्तुत पाश गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित काव्य कृत्ति विनय पत्रिका ' के ' श्री सीता स्तुति का से अवतरित है । इस पद्यांश में गोस्वामी जी ने सीता जी की स्तुति करते हुए उन्हें माँ कहकर संबोधित किया है तथा उनसे यह प्रार्थना की है कि यदि वे अपने प्राणनाथ भगवान श्री राम से मेरी सिफारिश कर देंगी तो इस भवसागर से मेरा सहज ही उद्धार हो जाएगा।


तुलसीदास के पद  व्याख्या : = सीता जी की वंदना करते हुए तुलसीदास जी कहते हैं कि हे माँ ! जब कभी आपको उचित अवसर करुण प्रसंग चलाकर श्रीराम की दया मनःस्थिति में मेरी याद दिलाने की कृपा करना । हे माता ! आप मेरे आराध्य श्रीराम को यह स्मरण कराना कि आपकी इस दासी का भी एक दास , उनका परम सेवक तुलसीदास बड़ी ही दीन - हीन अवस्था में है । उसके शरीरांग भी ठीक प्रकार से कार्य नहीं कर रहे हैं तथा वह अत्यधिक दुर्बल है । 

                     वह मैला - कुचैला रहता है तथा बहुत अधिक पापी है । आपके नाम का स्मरण करता हुआ वह अपनी उदरपूर्ति करता है । वह आपका अनन्य सेवक है । 

हे माता ! जब प्रभु आपसे मेरे विषय में पूछेगे कि तुम किसकी चर्चा कर रही हो ? तब आप उनको मेरा नाम बताते हुए मेरी दयनीय दशा के विषय में भली - भाँति समझा देना । मुझे इस बात का पूर्ण विश्वास है कि अगर मेरी बाते श्रीराम के कानों में पड़ गई तो मेरे दुर्दिनों का नाश हो जाएगा और मेरी बिगड़ी हुई बात बन जाएगी । 

               हे माता जानकी , आप संम्पूर्ण जगत की माता हो तथा संम्पूर्ण जगतवासियों का ध्यान रखती हो । अगर आप मेरी सहायता कर देंगी तो मैं तुलसीदास इस भवसागर से पार हो जाऊँगा तथा मेरा उद्धार हो जाएगा । 


                      ( 2 )

                      

द्वार हौं भोर ही को आजु । 

रटत रिरिहा आरि और न , कौर ही तें काजु ।। 

कलि कराल दुकाल दारुन , सब कुभांति कुसाजु । 

नीच जन , मन ऊँच , जैसी कोढ़ में की खाजु ।। 

हहरि हिय में सदय वृनयो जाइ सापु - समाजु । 

मोहुसे कहुँ कतहुँ कोउ , तिन्ह कहयो कोसलराजु ।। 

दीनता - दारिद्र दले को कृपावारिधि बाजु । 

दानि दसरवरायके , तू बानइत सिरताजु ।। 

जनमको भूखो भिखारी हो गरीननिवाजु । 

पेट भरि तुलसिहि जेंचाइय भगति - सुबा सुनाजु ।। 



प्रसंग := प्रस्तुत पद्यांश गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित काम्य कृति ' बिनय पत्रिका से अवतरित है । इस पयां में तुलसीदास जी श्रीराम के प्रति अपनी अडिग आस्था को प्रकट करते हुए उनसे प्रार्थना कर रहे . है कि ये उनके दुःखों को समाप्त करके उनका उद्धार करें । 


तुलसीदास के पद व्याख्या : = तुलसीदास जी कहते हैं . हे प्रभु आज में प्रातःकाल से ही आपके द्वार पर आकर बैठ गया है तथा गिड़गिड़ाकर आपसे प्रार्थना कर रहा हूँ । में आपसे और कुछ अधिक पाने का हठ नहीं कर रहा है , मैं तो केवल आपकी अनुकम्पा का एक टुकार ही पाने का इच्छुक हूँ । 

                  हे प्रभु! इस भयंकर कलियुग में बड़ा ही विकराल अकाल पड़ा हुआ है तथा सब कुछ बुरी तरह से अव्यवस्थित है । चूकि इस कलियुग में धर्म - कर्म भी निर्विघ्न पूरा नहीं हो पाता है , इसलिए मैने आपसे भिक्षा मांगना ही उचित समझा है । हे प्रभु । में एक जयम जीव है , लेकिन मेरी इच्छाएं बहुत ऊधी है तथा ये मुझे उसी प्रकार दुख देती हैं जिस प्रकार कोड़ में खाज दुखदायी होती है । मैंने दयालु साधु समाज से यह पूछताछ की है कि इस घोर संकट से मेरी रक्षा कोन कर सकता है तो उन साघु - र भी आपका नाम बताया है । उनके अनुसार कौशल राज श्रीराम अर्यात आप ही मुझे इन दुखों से उबार सकते हैं । 

                    हे कृपासिन्धु । आपके अलाया मेरी दोनता और दरिदता का नाश करने वाला और कौन है ? हे दशस्य पुत्र श्रीरामा आग जैसा महादानी कोई नहीं है । अगर आप बनाना चाहेंगे तो ही मेरी बात बन सकती है । केवल आपही मेरा उद्धार कर सकते हैं।

               हे श्रीराम में तो जन्म से ही एक भूखा भिखारी हूँ और आप गरीबों का कल्याण करने वाले हो । अतः में आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप मुझे अपने भक्ति रूपी उत्तम भोजन को पेट भरकर खिला दीजिए । कहने का भाव यह है कि मुझे जी भरकर अपनी भक्ति प्रदान कर दीजिए , जिससे मेरा मन इधर - उधर न भटके तथा में एकचित्त होकर आपकी भक्ति कर सकू । 


Board Class 12th Hindi Book Solutions पद्य :--

1. कड़बक

2. पद सूरदास

3. पद तुलसीदास

4.छप्पय 

5.कविप्त 

6. तुमुल कोलाहल कलह में 

7. पुत्र वियोग 

8.उषा

10.अधिनायक 

11.प्यारे नन्हें बेटे

12. हार जित

13. गांव का घर


तुलसीदास के पद व्याख्या अभ्यास :-

 प्रश्न 1: कबहुँक अंब असवर पाई । " यही " अंब " संबोधन किसके लिए है इस संबोधन का मर्म स्पष्ट करें ।

 उत्तर - इस पक्ति में ' अंब ' संबोधन ' मां सीता' के लिए किया गया है । यहाँ गोस्वामी तुलसीदास सीताजी को माँ कहकर उनके प्रति सम्मान की भावना प्रदर्शित कर रहे हैं । 


प्रश्न 2. प्रथम पद में तुलसी ने अपना परिचय किस प्रकार दिया है , लिखिए । 

उत्तर - तुलसीदास ने प्रथम पद में अपना परिचय देते हुए कहा है कि उनकी अत्यन्त दीन - हीन दशा है , वे अत्यंत दुर्बल है , उनके शरीर के अंग भी ठीक तरह से कार्य नहीं कर रहे । ये मैले कुचले रहते हैं तथा अनेक अवगुणों से युक्त है । ये हमेशा प्रभु राम के नाम का स्मरण करते हुए अपनी उदरपूर्ति करते हैं । ये भगवान श्री राम की दासी ( सीताजी ) के भी एक दास हैं । 


प्रश्न 3. अर्थ स्पष्ट करें- 

( क ) नाम से भरे उदर एक प्रभु - दासी - दास काह । 

( ख ) कति करात दुकाल दारुन , सब कुभाति कुसाजु । नीच जन , मन च , जेंसी कोड़ में की खाजु ।। 

( ग ) पेट भरि तुलसिहि जेवाइय भगति - सुधा सुनाज ।


 उत्तर- ( क ) प्रस्तुत पाश में तुलसीदास कह रहे हैं कि वह भगवान राम का गुणगान करके अपना जीवन - यापन कर रहे हैं । वे श्री राम की सेविका सीता माता के सेवक बनकर रहते हैं तथा राम कया द्वारा परिवार का भरण - पोषण करते हैं । 

 

( ख ) तुलसीदास जी कहते हैं कि कलियुग का समय अत्यंत भीषण तथा असय और पूर्णरूपेण अव्यवस्थित व दुर्गत्तिग्रस्त है । बात ' कोढ़ में खुजली के समान है । वैसे तो में निम्न कोटि का व्यक्ति हूँ पर मेरी बातें बड़ी - बड़ी ( ऊँची ) है जोकि कोढ़ में खाज के समान है अर्थात् ' छोटे मुँह बड़ी बात कोढ़ में खुजली के समान है।


( ग ) यहाँ तुलसीदास अपन प्रभुबाराम से प्रार्थना कर रहे है.कि वे उन्ह भाक्त - सुधा का अच्छा भोजन करा कर उनका पेट भरे। ताकि उनका मन इधर-उधर प्रलोभन में आकर ना भटके।


प्रश्न 5. तुलसी सोपे राम से न कहकर सीता से क्यों कहलवाना चाहते हैं?

 उत्तर : तुलसीदास ऐसा शायद इसलिए करना चाहते थे क्योंकि वह स्वयं अपनी बातें श्री राम के समक्ष रखने में संकोच का अनुभव कर रहे होंगे,उन्हें यकीन है कि सीता जी उनकी बातों को ढंग से भगवान श्री राम के समक्ष रखेगी।

 


प्रश्न 7. दूसरे पद में तुलसी ने अपना परिचय किस तरह दिया है , लिखिए । 

उत्तर - दूसरे पद में तुलसी ने अपना परिचय एक भिखारी के रूप में दिया है । वह गिलगिड़ाकर भीख मांगते हुए श्रीराम के कह रहे हैं कि हे श्रीराम ! में प्रातः काल से ही आपके द्वार पर बैठा भीख की रट लगाए हुए हूँ । में आपसे बहुत कुछ उनका हठ नहीं कर रहा है , बल्कि में तो आपकी अनुकम्पा का केवल एक टुकड़ा ही पाना चाहता है । तुलसी कहते हैं कि में तो जन्नाम का गरीब भिखारी हूँ । हे प्रभु श्री राम ! मुझे अपनी भक्ति रूपी सरस भोजन भरपेट खिला दीजिए । तभी में तृप्त हो जाऊंगा।


प्रश्न 8. दोनों पर्दो में किस रस की बंजना हुई है ? 

उत्तर - दोनों पदों में करुण रस की व्यंजना हुई है । 


प्रश्न 9. तुलसी के हृदय में किसका डर है ? 

उत्तर - तुलसी के हृदय में यह डर है कि अगर सीता माँ ने उनके बारे में श्रीराम से चर्चा नहीं की तो यह मुक्ति किस प्रकार प्राप्त करेगा अर्थात उसे मोक्ष की प्राप्ति कैसे होगी । तुलसी केवल अपनी मुक्ति चाहता है । यह तभी संभव हो सकता है जब सीता मैया उनके विषय में श्रीराम से कुछ कहें । 


प्रश्न 10. राम स्वभाव से केसे हैं , पठित पर्दो के आधार पर बताइए । 

उत्तर - राम स्वभाव से अतिकृपालु तथा अपने भक्तों का कष्ट निवारण करने वाले हैं । इस बात की पुष्टि तुलसी के शब्दों में इस तरह होती है । जब तुलसी ने कृपालु - संत समाज से पूछा कि मुझ जैसे उद्यमहीन को कौन शरण देगा तो संतों ने उत्तर दिया कि कोसलपति महाराज श्रीरामचन्द्र जी ही ऐसों को शरण में रख सकते हैं । हे कृपा के समुद्रः आपके अतिरिक्त और कोन दीनता और दरिद्रता का नाश कर सकता है । इस तरह के वाक्यों से राम के स्वभाव का पता चलता है । इसके अलावा कृपावारिधि , सिरताजु , मरीब निवाजु , जैसे शब्द भी उनके दयालु स्वभाव को दर्शाते हैं ।


 प्रश्न 11. तुलसी को किस वस्तु की भूख है ? 

 उत्तर - तुलसी को भक्तिरूपी अमृत समान सुन्दर व सरस भोजन की भूख है । वह भगवान श्रीराम से कहते हैं कि हे प्रभु , मैं जन्म - जन्म से आपकी भक्ति का मूखा हूँ । मुझे अपनी भक्तिरूपी अमृत का पान कराकर मेरी शुघा तृप्त कीजिए । 

 

प्रश्न 12. पठित पदों के आधार पर तुलसी की भक्ति - भावना का परिचय दीजिए । 

उत्तर - तुलसीदास जी श्रीराम के सगुण रूप के भक्त थे । उनकी भक्ति सेवक - सेव्य तथा स्वामी - दास भाव वाली है। उनकी यह प्रवृत्ति उनकी रचनाओं में सर्वत्र विद्यमान है । उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है 

राम सो बड़ो है कौन , मोसो कौन छोटो । 

राम सो सरो है कीन , मोसो कौन छोटो । 

तुलसी की भक्ति में एक अनंत गहराई थी जिसकी चाह पाना मुमकिन नहीं है । वे श्रीराम के प्रति पूर्ण समर्पित थे । वस्तुतः तुलसी एक सन्त थे , इसी कारण उनकी भक्ति में संतों वाली सहजता व सरलता थी । उनकी भक्ति सात्विक व शुद्ध थी । 




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